ऐसे लोग जीवनभर भटकते रह जाते है जिन्हे चाणक्य की ये 7 बाते नहीं मालूम

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आचार्य चाणक्य ने अपने नीति शास्त्र में, ऐसे सूत्रों का उल्लेख किया है, जिनका अनुसरण करके कोई भी व्यक्ति, अपने बुरे भाग्य को सौभाग्य में बदल सकता है। आचार्य ने अपनी नीतियों में अपने जीवन के सच्चे अनुभव के आधार पर अपनी नीतियों की रचना की है, जिसका उचित प्रकार से पालन करके और ज्ञान प्राप्त करके कोई भी व्यक्ति अपने दुर्भाग्य को दूर करने में सफल हो सकता है।

व्यक्ति की सही परख

आचार्य चाणक्य कहते हैं कि किसी व्यक्ति की परख उसके त्याग की भावना व अन्य गुणों के द्वारा किया जाना उचित होता है, जिस प्रकार स्वर्ण का परीक्षण उसे घिस कर, काटकर और अग्नि में तपाने के बाद उसे पीट कर किया जाता है, उसी प्रकार किसी व्यक्ति की सही परख करने के लिए, यह देखना आवश्यक है कि उस व्यक्ति में त्याग करने का कितना साहस है, और उसे लोक-व्यवहार का ज्ञान है या नहीं, इसके अतिरिक्त उस में और कौन-कौन से अच्छे गुण हैं? इन परीक्षणों के द्वारा ही किसी व्यक्ति की सही परख हो सकती है।

स्वाभाव में असमानता

आचार्य चाणक्य का कहना है कि एक साथ या एक ही गर्भ से जन्म लेने वाले सभी बच्चों की प्रवृत्ति ,स्वभाव व बनावट एक जैसी नहीं होती है, जिस प्रकार एक ही पेड़ से उत्पन्न होने वाले बेर फल, अपने आकार और स्वाद में एक जैसे नहीं होते हैं, उसी प्रकार एक ही नक्षत्र और गर्भ से जन्म लेने वाले सभी बच्चे, अपने स्वभाव, गुण व बनावट में एक जैसे नहीं होते हैं, उनमें कोई ना कोई मूलभूत असमानता अवश्य होती है।

ईर्ष्या का भाव

आचार्य के अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति की दूसरे व्यक्ति के साथ ईर्ष्या के अलग-अलग कारण होते हैं, जिस प्रकार कुरूप या बदसूरत महिलाएं, रूपवान या खूबसूरत महिलाओं से ईर्ष्या का भाव रखती हैं। कुमार्ग पर चलने वाली या कुसंस्कारी व चरित्रहीन महिलाएं, संस्कारी व पवित्र महिलाओं से स्वाभाविक तौर पर ईर्ष्या का भाव रखती हैं, और बुद्धिमान व ज्ञानवान व्यक्ति से, ऐसे लोग ईर्ष्या का भाव रखते हैं, जो बुद्धिहीन व मूर्ख होते हैं।

कौन क्या नहीं करता?

नीति शास्त्र में आचार्य का कथन है कि ऐसा व्यक्ति, किसी के साथ छल-कपट का कार्य नहीं करता, जो स्पष्ट बात करता हो, ऐसा व्यक्ति मधुर स्वर व मीठी भाषा का प्रयोग नहीं करता, जिसे पूर्ण व उचित ज्ञान ना हो, ऐसे व्यक्ति में अपने शारीरिक श्रृंगार व सजने-संवरने की प्रवृत्ति नहीं होती है जिसने अपने विषय-विकारों, कामनाओं और इंद्रियों को जीत लिया हो, और ऐसे लोग कोई भी कार्य नहीं करना चाहते या कामचोर होते हैं, जिन लोगों के हाथ स्वस्थ व सुकोमल हैं।

मनुष्य का अकेलापन

नीति शास्त्र के अनुसार, कोई भी व्यक्ति इस दुनिया में सर्वथा अकेला होता है, वह अपने सारे जीवन चक्र के अच्छे-बुरे कर्मों का फल अकेले ही भोगता है। वह अकेला ही जन्म लेता है, और अकेला ही मृत्यु को प्राप्त होता है। इस धरती पर उसकी जितनी जीवन अवधि होती है, वह अकेले ही अपने उचित और अनुचित कर्मों के कारण, नर्क के दुखों को या स्वर्ग के सुखों को भोगता है, और सद्गति की अवस्था को प्राप्त करता है। इस पूरे जीवन चक्र में कोई भी उसका साथ नहीं देता।

सच्चे मित्र

आचार्य चाणक्य के नीति सूत्र के अनुसार, उन्होंने यह बताया है कि किसी भी व्यक्ति के जीवन में कौन-कौन से सच्चे मित्र होते हैं? किसी व्यक्ति के लिए जीवन में, अपने कर्मों के द्वारा प्राप्त किए गए पुण्य फल उनकी मृत्यु के पश्चात सच्चे मित्र होते हैं, इसी प्रकार किसी रोगी के लिए दवा, अपने घर में पत्नी, और यात्रा के समय हमारा ज्ञान ही, हमारे सच्चे मित्र होते हैं।

इनकी कोई तुलना नहीं

आचार्य के अनुसार, इस दुनिया में ऐसी कई वस्तुएं हैं, जिनके जैसा कोई दूसरा नहीं हो सकता। वे स्वयं में अद्भुत होती हैं। जैसे इस दुनिया में अन्न से बढ़कर कोई धन-संपदा नहीं है। आंखों की ज्योति से बढ़कर दूसरा कोई प्रकाश नहीं है, इसी प्रकार अपनी स्वयं की शक्ति से बढ़कर कोई दूसरी शक्ति नहीं है, और वर्षा के जल के समान, दूसरा कोई जल नहीं है, ये ऐसी वस्तुएं हैं, जिनकी तुलना अन्य किसी से नहीं की जा सकती।


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