अपने पार्टनर को भूल से भी तुलना न करे वरना पछताना पड़ेगा | Indian Marriage Advice

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कुछ समाज विज्ञानियों का कथन है कि ‘सामाजिक तुलना का सिद्धांत बताता है कि किसी भी व्यक्ति में तुलना करने की भावना प्राकृतिक रूप से होती है’। जिससे उसे पता चलता है कि वह अच्छा है या बुरा। लेकिन जब यही तुलना रिश्तों में होने लगती है, तो उसका बुरा प्रभाव ही रिश्तों पर होता है। जब तक तुलना को खेल भावना से या प्रतियोगिता के रूप में लें, तब तक तो ठीक है, लेकिन जैसे ही व्यक्ति इसे अपनी असंतुष्टि से जोड़ता है, तब यह तुलना की भावना रिश्तों में दरार पैदा कर देती है।

अक्सर जीवन में लोग अपनी या दूसरों की तुलना किसी सफल व्यक्ति से करने लगते हैं, बिना यह सोचे समझे कि इसके पीछे कारण क्या हैं? जैसे ज्यादातर महिलाएं अपने रिश्ते से जब नाखुश होती हैं, तो वह अपने पार्टनर की तुलना, दूसरे लोगों से करने लगती है, चाहे वह शारीरिक तुलना हो, कैरियर की हो, सफलता की हो या पैसे की, और इसका बुरा प्रभाव उनके रिश्तों पर होने लगता है। उसी तरह पुरुष भी अपनी पार्टनर से किसी बात पर असंतुष्ट होने पर, उसकी तुलना अन्य महिलाओं से करने लगते हैं, जिससे उनके संबंधों में दरार आने लगती है, इसलिए ऐसी तुलना की भावना से बचकर रहना चाहिए। इस लेख में हम बताएंगे कि तुलना करने के क्या नुकसान है, और यह किस हद तक ठीक है?

सकारात्मक असर के लिए खेल भावना से करें तुलना

कभी भी किसी की तुलना प्रतियोगिता की भावना से और उसे सलाह देने के अंदाज में करें, न कि उसकी आलोचना करने के लिए। ऐसे में तुलना का सकारात्मक असर सामने वाले पर होता है। यदि एक वेट लिफ्टर 400 किलो वजन उठाता है, लेकिन दूसरा वेटलिफ्टर 300 किलो का वजन उठाता है, तो तुलना से उसके खेल में सुधार की संभावना हो सकती है। इसी प्रकार बच्चों को भी प्यार से तुलना तुलनात्मक रूप से समझाया जा सकता है कि यदि वह भी थोड़ा सा एकाग्र होकर अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे, तो वह दूसरे बच्चों से अच्छे मार्क्स ला सकता है। तब ऐसी तुलना से उनमें प्रतियोगिता की भावना आती है, और वह इसे खेल भावना में लेते हैं, और अपने परफॉरमेंस में सुधार करने की कोशिश करते हैं।

तुलना करने में रखें ये सावधानियां

किसी की भी दूसरों से तुलना करते समय कुछ सावधानियां रखनी चाहिए और सोच-समझकर अपने शब्दों का प्रयोग करना चाहिए, विशेषकर के बच्चों के मामले में। किसी की भी तुलना उसकी कमजोरी बताने, बुराई करने या आलोचना करने के लिए नहीं करनी चाहिए, न ही मजाक उड़ाने वाले शब्दों में। जैसे कि वह तो कर सकता है, तुम्हारी करने की हिम्मत ही नहीं है, तुम इस लायक ही नहीं हो, तुम कभी नहीं कर सकते हो, जैसे शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। ऐसे तुलना करने से उसके अंदर पॉजिटिव की बजाए, नेगेटिव विचार आने लगेंगे और उसके अंदर अपने प्रति हीन-भावना बन जाएगी, क्योंकि कोई व्यक्ति चाहे कितना ही बड़ा हो, सफल हो, पैसे वाला हो, कुछ समय बाद उससे भी अधिक पैसे वाला, सफल या बड़ा आदमी, दूसरा व्यक्ति बन सकता है, क्योंकि दुनिया में कोई भी चीज स्थाई नहीं है, इस बात का हमेशा ध्यान रखें।

तुलना करने में किन बातों का रखें ध्यान ताकि इसका पॉजिटिव असर हो

तुलना करते समय यह ध्यान रखें कि कोई भी दो व्यक्ति एक समान नहीं हो सकते। हर व्यक्ति के अंदर कोई न कोई स्पेशल क्वालिटी जरूर होती है, जो दूसरों में नहीं होती इसलिए यह सोच-समझकर तुलना करें। हमेशा पॉजिटिव ढंग से किसी की भी तुलना करें, ताकि इसका पॉजिटिव असर ही सामने वाले व्यक्ति पर हो, सिर्फ अपने असंतुष्टि या आलोचना के लिए, किसी की तुलना दूसरे से ना करें।

तुलना करते समय इन बातों का ध्यान रखें

विजेता बदलते रहते हैं

इस बात को हमेशा याद रखें कि जीत कभी स्थाई नहीं होती और विजेताओं के नाम बदलते रहते हैं। इस दौड़ में किसी पल के लिए कोई विजेता हो सकता है, किंतु अगले ही पल विजेता बदल जाते हैं, इसलिए अपने पार्टनर की तुलना भी सोच समझकर करें।

नकल ना करें

अपनी कमजोरी और क्वालिटी को समझे बिना, किसी दूसरे से तुलना ना करें। यानि कि दूसरे की नकल ना करें। जो आपकी खासियत है, उसी में कुछ नया करें। याद रखें, नकल करने वाले नहीं, बल्कि कुछ नया करने वाले ही इतिहास रचते हैं।

हौसला बढ़ाएं

हर व्यक्ति में कोई न कोई विशेष बात होती है, इसलिए अपने पार्टनर की बेकार की तुलना करने की बजाय, उनका हौसला बढ़ाएं, उन्हें हिम्मत दें, उनका साथ दें और तुलना करने की बजाय उदाहरण देकर समझाएं, ताकि इसका पॉजिटिव असर उनकी सोच पर हो सके और वे भी अपने कामों में सफल हो सके।

लक्ष्य पर ध्यान जरूरी है

दूसरों से तुलना को पॉजिटिव सोच देने के लिए, उसकी तरह मेहनत और लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करने की सलाह देनी चाहिए और उसके अंदर लक्ष्य को प्राप्त करने का जुनून पैदा करना चाहिए। अच्छे प्रदर्शन पर शाबाशी भी देनी चाहिए और उसकी क्वालिटी के अनुसार ही लक्ष्य को तय करना चाहिए।

पॉजिटिव और लॉयल रहें

दूसरों से तुलना करने में सख्त रवैया नहीं अपनाना चाहिए, नहीं तो इसका बुरा प्रभाव खुद पर होने लगता है, बल्कि तुलना को सामान्य, समझदारी से, पॉजिटिव सोच से, लॉयल और सहयोग करने की भावना के साथ, लेना चाहिए। ऐसी सोच और व्यवहार से, व्यक्ति तुलना को एक चैलेंज के रूप में लेता है और अपनी पूरी काबिलियत के साथ, उसे पूरा करने की कोशिश करता है, और इसका कोई बुरा प्रभाव भी उस पर नहीं होता है।

इस लेख से आप समझ गए होंगे की तुलना चाहे अपने पार्टनर की हो, या बच्चों की या खुद की, तुलना करते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए और किस प्रकार से तुलना करनी चाहिए? अब इस काम की जानकारी को आगे अपने दोस्तों के साथ भी शेयर करें।

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