कलयुग में जल्दी सफलता दिलाने वाले 9 सूत्र

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कूटनीति और राजनीति के महान ज्ञाता आचार्य चाणक्य ने, अपने जीवन के वृहत अनुभव और गूढ़ रहस्यों का, एक नीति-शास्त्र में संकलन किया, जिससे दुनिया चाणक्य-नीति के नाम से परिचित है। इस नीति-शास्त्र में जीवन के यथार्थ और आदर्श दोनों का सामंजस्य रखते हुए, आचार्य द्वारा ऐसे सूत्रों की रचना की गई है, जो जीवन में सफलता प्रदान करने के लिए, बहुत उपयोगी व लाभदायक हो सकते हैं।

समय से सीख

नीति शास्त्र में आचार्य चाणक्य कहते हैं कि हमें सुखी रहने के लिए, केवल वर्तमान में ही जीना चाहिए। भूतकाल में या बीते हुए समय के बारे में सोच कर के, पश्चाताप करना और दुखी होना बेकार होता है। हमें अपने भविष्य को उज्जवल बनाने के लिए, और सफलता प्राप्त करने के लिए, बीते समय में या भूतकाल में हमसे जो भी गलतियां हुई है, उससे शिक्षा लेकर अपने वर्तमान में अच्छा कार्य करना चाहिए।

निकृष्ट धन का मोह

इस सूत्र में आचार्य कहते हैं कि ऐसा धन निकृष्ट होता है, ऐसे धन का लालच कभी नहीं करना चाहिए व ऐसे धन का त्याग कर देना चाहिए, जिसे प्राप्त करने के लिए अपने धर्म को छोड़ना पड़े, शत्रुओं की, दुश्मनों की चापलूसी करनी पड़े व उनके अधीन रहना पड़े, उनकी गुलामी करनी पड़े या फिर बहुत अधिक कष्ट सहने करने के बाद, जो धन प्राप्त होता हो, क्योंकि ऐसे धन का व्यक्ति के लिए कोई अर्थ नहीं होता है।

कार्य प्रारंभ में तीन बातें

नीति शास्त्र के अनुसार हमें किसी भी कार्य में सफलता के लिए, उस कार्य को आरंभ करने के पूर्व तीन बातों पर का ध्यान अवश्य रखना चाहिए, वे बातें हैं कि इस कार्य को प्रारंभ करने का कारण क्या है? इस कार्य का प्रतिफल या परिणाम क्या हो सकता है? और क्या मैं इस कार्य में सफल हो सकूंगा या मुझे सफलता प्राप्त होगी? अथवा नहीं, इन तीन बातों पर पूरी तरह गौर करने के बाद और संतोषजनक उत्तर पाने के बाद ही, कोई कार्य प्रारंभ करना उचित होता है।

ताकत का दिखावा

आचार्य कहते हैं कि हमें अपनी कमजोरी को किसी के भी सामने प्रदर्शित नहीं करना चाहिए, जिस प्रकार यदि कोई सांप विषैला ना भी हो, तो भी उसे अपने फुंफकारने और डंसने का गुण नहीं छोड़ना चाहिए क्योंकि, उसने अगर फुंफकारना छोड़ दिया और उसके विषैला ना होने का लोगों को पता चल गया, तो उसके लिए प्राणों का खतरा हो जाएगा, इसी प्रकार कोई व्यक्ति शक्तिहीन हो या दुर्बल हो या ताकत से विहीन हो, तो भी उसे लोगों से अपनी शक्तिहीनता या दुर्बलता के बारे में बात नहीं करनी चाहिए, अन्यथा ऐसा होने पर लोग उसे व्यर्थ ही परेशान करने लगेंगे।

गुणों की खुशबू

आचार्य का कथन है कि किसी व्यक्ति के गुणों की खुशबू चारों दिशाओं में अपने आप ही फैल जाती है। किसी फूल या सुगंधित पदार्थ की खुशबू के प्रसार के लिए, हवा की आवश्यकता होती है और उसकी खुशबू केवल हवा की दिशा में ही फैलती है, किंतु व्यक्ति के गुणों की महक के लिए, किसी हवा की आवश्यकता नहीं होती है, यह स्वयं ही चारों दिशाओं में प्रसारित हो जाती है।

अन्य के निवास में रहना

इस सूत्र का तात्पर्य है कि किसी व्यक्ति की आजादी से बढ़कर कुछ नहीं होता है, इसलिए किसी के परतंत्र रहना या किसी के अधीन रहना, बहुत कठिनाई भरा और दुखों का कारण होता है, किंतु इससे भी ज्यादा कठिनाई का कार्य होता है, किसी दूसरे के निवास स्थान में रहना, किसी दूसरे के घर में निवास करना, क्योंकि वहां व्यक्ति पूरी तरह दूसरे पर आश्रित होता है, और स्वयं असहाय हो जाता है, उसे दूसरों की इच्छा के अनुसार अपना कार्य करना पड़ता है, जोकि बहुत कष्टदायक होता है।

दुष्ट मित्र का त्याग

आचार्य चाणक्य के अनुसार, ऐसे पात्र में, जिसके ऊपर हिस्से में दूध लगा हुआ हो, और उसके अंदर प्राणघातक विष भरा हुआ हो, उसका त्याग कर देना चाहिए, उसी प्रकार हमें ऐसे दुष्ट मित्रों का भी त्याग कर देना चाहिए, जो हमारे सामने मधुर वाणी बोलता हो, अच्छी बातें करता हो, और पीठ पीछे षड्यंत्र करता हो, हमारे कार्यों में विध्नपहुंचाता हो, उसे खराब कर देता हो, ऐसा मित्र हमारे लिए बहुत हानिकारक और कष्टदायक होता है।

कमजोर दुश्मन

इस सूत्र का तात्पर्य है कि किसी शक्तिहीन या दुर्बल व्यक्ति की शत्रुता को नजर अंदाज नहीं करना चाहिए, क्योंकि ऐसा कमजोर शत्रु अधिक हानिकारक हो सकता है। ऐसा व्यक्ति अपनी दुर्बलता के कारण, आप पर उस समय वार कर सकता है, जब आप उसके बारे में सोच भी नहीं सकते हैं। ऐसा व्यक्ति विश्वासघात करके आप पर वार करता है, जिससे आपके प्राणों का संकट हो सकता है, इसलिए ऐसे शक्तिहीन शत्रुओं से सावधान रहना ही उचित होता है।

कर्मों के फल

नीति-शास्त्र के इस सूत्र में आचार्य का कथन है कि किसी व्यक्ति के कर्मों का फल, इसी जगत में उसे प्राप्त होता है। जिस प्रकार हजारों गायों के बीच में भी, बछड़ा अपनी माता को ढूंढ लेता है, उसी प्रकार किसी व्यक्ति द्वारा किए हुए, कर्मों के फल उस व्यक्ति को, उसके इसी जीवन में अवश्य प्राप्त होते हैं, उनसे बचने का कोई उपाय नहीं है।


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