मनुष्य को जीते जी आग में जलाती है यह 6 बातें

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महान विद्वान आचार्य चाणक्य द्वारा लिखित, नीति-शास्त्र में कई ऐसे नीति सूत्र हैं, जिनके गहरे अर्थों को समझ कर और उनका अनुसरण करके, जीवन में आने वाले सुख-दुख का ज्ञान प्राप्त हो सकता है, और समस्याओं को दूर करने में सहायता मिल सकती है। इन सूत्रों में आचार्य चाणक्य ने किसी मनुष्य को जीते-जी जलाने वाली 6 परिस्थितियों का वर्णन किया है, वे परिस्थितियां इस प्रकार हैं।

आचार्य चाणक्य के अनुसार

कांता-वियोगः स्वजनामानो, ऋणस्य शेषः कुनृपस्य सेवा।
दरिद्रभावो विषमा सभा च, विनान्गिना ते प्रदहन्ति कायम्।।

इस श्लोक का अर्थ इस प्रकार है

किसी व्यक्ति का उसकी प्रेमिका या पत्नी से जुदाई

आचार्य चाणक्य के अनुसार पत्नि या प्रेमिका से दूर रहना, किसी भी प्यार करने वाले व्यक्ति को अंदर ही अंदर जलाती रहती है। वह अपनी प्रेमिका या पत्नी से दूरी को बर्दाश्त नहीं कर पाता है, इस विरह या विछोह की आग उसे हमेशा जलाती रहती है।

किसी रिश्तेदार या मित्र द्वारा किया गया निरादर

इस सूत्र में आचार्य का कहना है कि अपने किसी प्रियजन, करीबी व्यक्ति, मित्र या रिश्तेदारों द्वारा किया गया अनादर, कोई भी व्यक्ति जल्दी भुला नहीं पाता है, क्योंकि अपने करीबी मित्र या रिश्तेदार द्वारा किया गया, अपमान हमें बहुत दुख देता है, और उसे सोच-सोचकर हम अंदर ही अंदर घुटते रहते हैं। यह अपमान की आग हमें अंदर से जलाती रहती है।

बचा हुआ कर्ज

इस सूत्र में आचार्य कहते हैं कि जब कोई व्यक्ति, अपनी सामर्थ्य से अधिक मात्रा में कर्ज ले लेता है, और कर्ज में डूब जाता है, इस स्थिति में वह उसे लौट पाने में असमर्थ हो जाता है, तब ऐसी अवस्था में उसे हर समय ऋण का बोझ अपने ऊपर महसूस होता है, और अंदर से सोच-सोच कर व चिंता करने से, यह बात उसे बहुत पीड़ा देती है और जलाती रहती है, इसलिए जिस ऋण को चुका पाने में व्यक्ति असमर्थ होता है, वह उस व्यक्ति के दुखों का कारण होता है।

दुष्ट स्वभाव के राजा या मालिक की सेवा

इस सूत्र में आचार्य कहते हैं कि कोई भी व्यक्ति, जो किसी दुष्ट स्वभाव के राजा या मालिक की सेवा का कार्य करता है, वह अंततः उस व्यक्ति के लिए कष्टों का कारण बनता है, क्योंकि ऐसे चरित्रहीन, नीच व कपटी स्वभाव के राजा या मालिक, अपने सेवक का कोई भला नहीं कर सकते बल्कि वे उसका नुकसान ही करते हैं, इसलिए ऐसे छल-कपट वाले व नीच स्वभाव के राजा या मालिक के सेवक हमेशा ऐसे लोगों से त्रस्त और पीड़ित रहते हैं।

गरीबी का दुःख

नीति शास्त्र में आचार्य का कथन है कि गरीबी किसी भी व्यक्ति को अंदर ही अंदर जलाती रहती है, क्योंकि गरीबी एक अभिशाप है। कोई भी दरिद्र व गरीब व्यक्ति, अपने आर्थिक समस्याओं की वजह से हमेशा दुखी वह चिंतित रहता है, यह चिंता और दुख उसे अंदर से हर समय जलाती रहती है, इसलिए किसी भी व्यक्ति के लिए, दरिद्रता या गरीबी से बड़ा कोई दुख नहीं है।

साथ रहने वालों का स्वार्थी स्वभाव

इस अंतिम सूत्र में आचार्य चाणक्य ने बताया है कि कोई भी व्यक्ति समाज में कई लोगों के साथ मिल-जुल कर रहता है, ऐसे में यदि किसी व्यक्ति के साथ रहने वाले लोग, स्वार्थी और लालची स्वभाव के हैं तो उन्हें अपने स्वार्थ की पूर्ति के अलावा और कुछ नहीं सूझता है, और व्यक्ति को ऐसे लोगों के साथ ही रहना पड़ता है, तो यह बहुत कष्टदायक होता है, और ऐसे लोगों के स्वार्थी स्वभाव का दुख व्यक्ति को अंदर से जलाता रहता है, क्योंकि कोई भी स्वार्थी व्यक्ति कभी किसी का भला नहीं कर सकता है।


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